शाह अस्त हुसैन बादशाह अस्त हुसैन
दीन अस्त हुसैन दीन पनाह अस्त हुसैन बड़ी ।
सर दाद न दाद दस्त दर दस्ते यज़ीद
हक़्का के बिनाए लाएला हस्त हुसैन।।
ख्वाजा गरीब नवाज
हिजरत के तीसरे साल तीन शाबान 4 हिजरी( सन 625 ईसवी )की सुबह सादिक नमूदार हुई। हजरत फात्मा के बत्न से एक बच्चे की विलादत हुई । जन्नत में हूरों ने नगमा सुनाना शुरू कर दिया कि-
हजरत फातिमा जहरा की शान ए अक़दस में।
" घरमें अली के बोलता कुरआन आ गया।
अल्लाह के रसूल ने छोटे नवासे की विलादत की खबर सुनी तो खुशी-खुशी बेटी के घर तशरीफ लाए। रसूल ने बच्चे को गोद में लिया और उसे अपनी जुबान चुसाना शुरू कर दी। बच्चे ने आंखें खोल कर अपने नाना के पुर नूर चेहरे की जियारत की। नबी ने बच्चे का नाम हुसैन रखा। दुनिया में इससे पहले किसी का नाम हुसैन नहीं था। नबी ने हुसैन के एक कान में आज़ान और दूसरे कान में अक़ामत कही । नवासा ए रसूल 'जिगर गोशाए बतूल'राक़िबे दोशे मुस्तुफा, गुलशन ए फातिमा का महकता हुआ फूल, शहीद-ए-आजम और फातहे कर्बला वगैरा-वगैरा हुसैन के मखसूस लक़ब हैं।
अल्लाह के हबीब ने हुसैन को गोद में लिया और आसमान की तरफ मुंह करके फरमाया कि "हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूं।"ए खुदा तू दोस्त रख उसे जो मेरे हुसैन को दोस्त रखें और दुश्मन जान उसे जो मेरे हुसैन से दुश्मनी रखे।https://gharelunushkea.blogspot.com/?m=1
बक़ौल अम्न लखनवी
इंसानियत की शान बा नामे- हुसैन है
यानी बहुत बुलंद मुक़ामे हुसैन है।।
उस हुसैन की अजमत का कौन अंदाजा लगा सकता है कि जिसने खातून ए जन्नत का दूध पीकर नबी की गोद में परवरिश पाई हो।
बकौल किसी शायर के-
आईने मशीयत का शनासा ऐसा
हो क़दमों में कौसर वो प्यासा ऐसा
क्यों फख्र से झूमे न रसूले अरबी
तक़दीर से मिलता है नवासा ऐसा।।
नाना पैग़म्बरे इस्लाम की रहम दिली,बाप शेरे खुदा की बहादुरी, मां खातून ए जन्नत का सब्र और भाई का ईसार हुसैन में जमा हो गए थे यानी इमाम हुसैन पंजतन पाक की सीरत का आईना थे।
जो अल्लामा डॉक्टर इकबाल ने क्या खूब कहा है कि-
अल्लाह-अल्लाह बारे बिस्मिल्लाह पदर
मानिए ज़िबह -अज़ीम आमद परिसर
यानी अल्लाह अल्लाह क्या मर्तबा है?कि बाप( हज़रत अली ) तो बिस्मिल्लाह की बे के नीचे लगा नुक्ता हैं और बेटा (इमाम हुसैन )हजरत इस्माइल की कुर्बानी के बदले अल्लाह की तरफ से ज़िबहे अजीम (बड़ी कुर्बानी) करार दिया गया है।
हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सदके में फरिश्ते के बालों पर दोबारा मिल जाना, बचपन में फरिश्तों का झूला झूलाना, इन की दुआ से राहिब को साथ बेटे मिल जाना, जन्नत से कपड़े आना, रसूल का ईद के दिन इनके लिए नाका (सवारी) बनना, और हुसैन की वजह से नमाज में सजदे को तूल देना, वगैरह यह ऐसी बातें हैं कि जिससे इमाम हुसैन की अजमत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
मस्जिद-ए-नबवी में हर रोज 5 वक्तो की बा जमाअत नमाज़ों के बाद पैग़ंबरे इस्लाम के खुत्बे, घर में सारा दिन फरिश्तों की आवाजाही तक्बीरों की सदाएं जिक्र ए इलाही के चर्चे क़ुरआनी आयतों का नजूल और हर वक्त इस्लाम और मुसलमानों की भलाई की बातें हैं यह वह मंजर थे जो इमाम हुसैन की नजरों में हमेशा घूमते रहते थे। ऐसे नूरानी रूहानी और पाकीजा माहौल में पलने वाले इमाम हुसैन के लिए मुमकिन ही ना था कि वह यजीद जैसे जालिम और बद किरदार इंसान की बैअत कर लेते।
क़ुरआने करीम, इस्लामी तालीम, शरीयत ए मोहम्मदी और सुन्नते रसूल की हिफाजत की जिम्मेदारी अब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर ही थी इमाम हुसैन की जिंदगी का मकसद ला इलाहा इलल्लाह के साए में निजाम ए मुस्तफा की बुनयादों को मजबूत करना था।https://gharelunushkea.blogspot.com/?m=1
बकौल जोश मलीहाबादी के-
ए बारे एलाह नोहा सुनाता फिरता
ता रोज़े हश्र अश्क़ बहाता फिरता
इमदाद ना करते अगर कर्बला में हुसैन
इस्लाम तेरा ठोकरें खाता फिरता।।
क़म्बर अब्बास नकवी
कुन्दरकी मुरादाबाद ।
कौन यज़ीद
इतिहास के मुताबिक बद्र,ओहद और खन्दक की जंगो में दुश्मनों को कुचलने के बाद जब मुसलमानों ने मक्का शहर पर इस्लामी परचम लहरा दिया तो अबू सुफियान ने भी इस्लाम कबूल कर लिया। अबू सुफियान के 8 बेटे थे। https://aksejamal.blogspot.com/2019/10/blog-post_26.html?m=1
उन्हें सबसे ज़ियादा अपने दो बेटों यजीद और माविया से मुहब्बत थी यज़ीद की अपने बाप के सामने ही मौत हो गई थी चुनांचे अमीरे माविया ने अपने भाई के नाम को जिंदा रखने के लिए अपने बेटे का नाम यजीद रखा था
यजीद की मां का नाम मैसून था। वह नज़्द के आदीवासी इलाक़े की बद्दू खानाबदोश (घुमक्कड़) कबीले की एक खूबसूरत औरत थी उसके परिवार वाले बंदरों , कुत्तों का खेल तमाशा दिखा कर अपना पेट पालते थे। मैसून खुद भी इस फन में माहिर थी। अमीरे माविया से शादी के बाद मैसून शाही महल में आ गई।
मैसून का दिल बहलाने के लिए अमीरे माविया ने खास इंतजाम किए थे उस की खिदमत के लिए खूबसूरत कनीज़े हमेशा मौजूद रहती थी। महल के बराबर में ही एक बगीचा बनाया गया था बगीचे को रंग-बिरंगे फूलों और सुनहरी झालरों से सजाया गया था। बगीचे के बीचो बीच ही एक शानदार झोपड़ी बनाई गई थी। उसमें मखमली गद्दे बिछे थे। मगर इन ठाट बाट और दिलकश नजारों के बावजूद जंगली माहौल में पलने वाली मैसून महल में हमेशा उदास रहती थी। अमीरे माविया को जब इसका पता चला तो उन्होंने मैसून को उसके मायके भेज दिया। उस वक्त यजीद मां के पेट में था यजीद अपने ननिहाल में ही पैदा हुआ आंखें खोलते ही उसने ननिहाल में पल रहे कुत्तों और बंदरों की सूरते देखी यजीद नज़्द में अपनी ननिहाल के जगंली व जाहिल माहौल में ही पैदा हुआ। आंखें खोलते ही उसने ननिहाल में पल रहे कुत्तों और बंदरों की सूरतें देखी ।यज़ीद नज़्द में अपनी ननिहाल के जगंली व जहिल माहोल में पलता रहा ।वह जब 2 साल का हुआ तो अमीरे माविया ने उसे अपने पास बुलवा लिया अमीरे माविया यज़ीद से बहुत मोहब्बत करते थे मगर शाही महल के ठाठ-बाट भी यज़ीद के ज़हन से ननिहाल के जंगली माहौल की कालिख को नहीं मिटा सके।यज़ीद जैसे-जैसे बड़ा होता गया वह संभलने के बजाय बिगडता ही चला गया।
यजीद की बद किरदारी और बंद चलनी का यह हाल था कि वह हर वक्त खूबसूरत लड़के और लड़कियां अपने पास रखता था । हर वक्त नाच रंग की महफिलें सजी रहतीं ।हर सुबह उठता तो शराब के नशे में मदमस्त होता था। कुत्तों और बंदरों का तोहफा उसे अपनी नजदी ननिहाल से मिला था। यजीद लड़कों और लड़कियों से शाम तक कुत्तों व बंदरों से खेलता रहता था। बंदरों को आलिमों के कपड़े पहनाकर उन्हें सोने की टोपियां पहनाता था । पूरी इंसानियत को शर्मसार करने वाली हरकत यजीद में यह थी कि वह अपनी सौतेली मां और सौतेली बहनों से मुंह काला करता था। यज़ीद खुलेआम उन सभी चीजों को हलाल कहता था जिन्हें इस्लाम ने हराम करार दे रखा था। यजीद नमाजों को तर्क करता था। यजीद इंसानियत के दामन पर बदनुमा दाग था। यही है वह यज़ीद जिसने पैग़ंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्ला वाले वसल्लम के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके 72 साथियों को 3 दिन का भूखा प्यासा इसलिए शहीद कर दिया था क्योंकि उन्होंने बदकिरदार यजीद की बैअत नहीं की थी।https://gharelunushkea.blogspot.com/?m=1
हकीकत तो यह है कि खुलेआम शराब पीना बलात्कार करना भाई बहन की आपस में शादियों को जायज बताना नाच गाने में मस्त रहना मज़लूमों पर जुल्म करना और खुदा और उसके रसूल के कानून को मिटा देना ही यज़ीद का मिशन था।
यजीद का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं था इसका इकरार यजीद ने खुद इस तरह किया है रिवायतों के मुताबिक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का सर जब यजीद के सामने आया तो उसने भरे दरबार में खुश होकर ये शेर पढ़ना शुरू कर दिए कि काश मेरे वह बुजुर्ग जो जंग-ए-बदर और ओहद में क़त्ल किए गए आज मौजूद होते तो खुश होकर वह मुझे दाद देते कि मैंने आले मोहम्मद से उनका बदला ले लिया है और बनी हाशिम को क़त्ल किया है। और मोहम्मद पर ना कोई फरिश्ता आया था ना कोई वही, इस्लाम उनका अपना मनघढत ढोगं था (नावज़ोबिल्ला) बनी हाशिम ने हुकूमत को हासिल करने के लिए एक खेल खेला था । उलेमा ए इस्लाम इस पर मुत्ताफिक है कि यज़ीद बेशक पलीद था इसे पलीद लिखना और कहना जायज़ है।https://almas110.blogspot.com/2019/10/blog-post.html?m=1
उलेमा ए इस्लाम के मुताबिक शरीयते मोहम्मदी में किसी को हक नहीं कि वह उस में तब्दीली करें क़ुरआनों सुन्नत का मजाक उड़ाए और इस्लामी चीजों को पायमाल करे जबकि यजीद एलानिया यह सब कुछ कर रहा था।।
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Yazeed pe lantern
ReplyDeletebeshumar
beshumar lanat
DeleteYazeed pe lanat beshumar
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