Friday, October 18, 2019

अक़्से जमाल

                       अक़्से जमाल
ना पूरी होंगी कभी हसरतें जमाने की
हज़ार कोशिशें करले हमें मिटाने की
क़फ़स का ग़म है न है फिक्र आशियाने की
हमें तो फिक्र है बस गुलिस्तां सजाने की
शराब से है न पयमाने से न साक़ी से
हमारे दम से है अज़मते शराब खाने की
जो चढ़ के दार पे हमने जुनूं में छेड़ा था
फिज़ा में गूंज है अब तक इसी तराने की
तुम्हारा हाथ मेरे  हाथ में जो आ जाए
क़सम खुदा की झुका दूं नज़र ज़माने की
अदाएं सीख लें हम दोनों आओ असग़र से       ं
मैं तीर खाने की और आप मुस्कुराने की
ग़ुलाम ज़हन हैं जिनके फिग़ार उन के लिएं
बहुत बुलंद हैं दीवार क़ैदख़ाने की

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