अक्से जमाल
होती है जिसकी जैसी ज़ात
करता है वह वैसी बात
औरों को इल्ज़ाम न दो
अपनी इज्जत अपने हाथ
वजह निदामत की होगी
घर से निकले घर की बात
शोक़े नज़ारा क्या कीजिए?
बे पर्दा हैं मस्तुरात
रोए हंसी पर ज़ुल्फे सियाह
आधा दिन है आधी रात
चारों तरफ है फूल ही फूल
शायद तुमने की है बात
वह सब का है सब उसके
गुड से मीठी जिसकी बात
आप के जलवों के सदक़े
मेरी सारी मंज़ु मात ।
होती है जिसकी जैसी ज़ात
करता है वह वैसी बात
औरों को इल्ज़ाम न दो
अपनी इज्जत अपने हाथ
वजह निदामत की होगी
घर से निकले घर की बात
शोक़े नज़ारा क्या कीजिए?
बे पर्दा हैं मस्तुरात
रोए हंसी पर ज़ुल्फे सियाह
आधा दिन है आधी रात
चारों तरफ है फूल ही फूल
शायद तुमने की है बात
वह सब का है सब उसके
गुड से मीठी जिसकी बात
आप के जलवों के सदक़े
मेरी सारी मंज़ु मात ।
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